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सीमा पार जासूसी, कराची का अंडरवर्ल्ड और रणवीर का जबरदस्त एक्शन — धुरंधर की पूरी कहानी

“घायल हूँ इसलिए घातक हूँ।” यह संवाद भले ही सनी देओल की 90 के दशक की एक्शन फिल्मों की याद दिलाता हो, लेकिन यह रणवीर सिंह के उस जुनून और इंतज़ार की आग को भी बयान करता है, जो उनकी नवीनतम फिल्म धुरंधर में साफ दिखाई देता है। करीब 3 घंटे 32 मिनट लंबी यह फिल्म अपने निर्माण और रिलीज़—दोनों में ही—एक लंबा सफ़र तय करके दर्शकों तक पहुँची है।
रणवीर सिंह एक बार फिर धमाकेदार वापसी करते हैं और साबित करते हैं कि वे हर रूप, हर रंग में ढलने का बेजोड़ हुनर रखते हैं। धुरंधर में उनका किरदार जंगली भी है, चालाक भी, और एक निर्दयी हत्या मशीन भी—लेकिन फिर भी कहीं न कहीं इंसानियत की हल्की लौ जलती दिखती है।
निर्देशक आदित्य धर, जिन्होंने उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सफल फ़िल्म दी थी, इस बार एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं जो सीमा-पार जासूसी थ्रिलर और गैंगस्टर ड्रामा के बीच लगातार झूलती रहती है। कहानी की पृष्ठभूमि 1999 के आईसी-814 कंधार अपहरण और 2001 के संसद हमले जैसे वास्तविक घटनाक्रमों से प्रेरित है, लेकिन फिल्म का पहला हिस्सा इससे कहीं अधिक व्यापक घटनाओं को समेटता है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत 30 दिसंबर 1999 से होती है, जब भारत तीन ख़तरनाक आतंकियों—मसूद अज़हर, उमर शेख और मुश्ताक अहमद ज़रगर—को रिहा करने पर मजबूर था। क़ैदियों की रिहाई के खिलाफ इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अजय सान्याल (आर. माधवन) का कड़ा विरोध और फिर नौकरशाही के सामने उनकी हार—इन्हीं पलों में ‘प्रोजेक्ट धुरंधर’ की नींव रखी जाती है।
यहीं से प्रवेश होता है हमज़ा अली मज़ारी उर्फ़ जसकीरत सिंह रंगीली (रणवीर सिंह) का—एक ऐसा “हथियार” जिसे पाकिस्तान के कराची के कुख्यात ल्यारी में घुसपैठ के लिए तैयार किया गया है।
फिल्म में विस्तार से दिखाया गया है कि किस तरह पाकिस्तान में गैंगस्टर-राजनीतिक-ISI गठजोड़ भारत विरोधी गतिविधियों का संचालन करता है, और कैसे ल्यारी की सत्ता पूरे कराची और फिर देश की राजनीति को प्रभावित करती है।
अभिनय
रणवीर सिंह के अलावा कई कलाकार फिल्म में यादगार प्रदर्शन देते हैं—
* अक्षय खन्ना एक प्रभावशाली ल्यारी गैंगस्टर के रूप में चमकते हैं।
* संजय दत्त, पाकिस्तानी सुपरकॉप असलम से प्रेरित किरदार में, एक दमदार स्क्रीन प्रेज़ेंस छोड़ते हैं।
* अर्जुन रामपाल, आईएसआई मेजर इकबाल के रूप में, सीमित समय में भी तीखी छाप छोड़ते हैं।
* नवोदित सारा अर्जुन विद्रोही यलीना के रोल में चौंकाती हैं।
* राकेश बेदी (जमील जमाली) और गौरव गेरा भी प्रभावशाली हैं।
हिंसा, पावर और मनोविज्ञान
फिल्म कई जगह दर्शकों के दिल पर भारी पड़ती है—खासकर मेजर इकबाल के टॉर्चर वाले दृश्यों में। ये दृश्य दिल दहला देने वाले हैं और फिल्म के गंभीर स्वर को और तीखा करते हैं।
संगीत और तकनीकी पक्ष
शाश्वत सचदेव का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की आत्मा बनकर उभरता है।
कहानी में हवा हवा, चुपके चुपके, आफ़रीन आफ़रीन जैसी क्लासिक धुनों का चतुराई से इस्तेमाल इसे और गहराई देता है।
कमज़ोर कड़ी
फिल्म का दूसरा भाग, जो पूरी तरह से एक अलग फिल्म जैसा लगता है, कुछ दर्शकों को थोड़ा खटक सकता है।
साथ ही, कई महत्वपूर्ण दृश्य भाग दो के ट्रेलर में पहले ही दिखा दिए गए थे—जो अब 19 मार्च 2026 को रिलीज़ होगा।
निष्कर्ष
धुरंधर एक विशाल स्केल पर बनी, दमदार अभिनय और रोमांच से भरी फ़िल्म है। यह हिंसा, राजनीति, जासूसी और गैंगस्टरों के जटिल गठजोड़ को बेहद सिनेमाई अंदाज़ में पेश करती है।
फिल्म एक सवाल छोड़कर आगे बढ़ती है—
क्या दूसरा भाग रणवीर सिंह को और भी बड़ा मंच देगा?
इसका जवाब दर्शक मार्च 2026 में सिनेमाघरों में ही देख पाएँगे।
कुल मिलाकर—धुरंधर एक बार ज़रूर देखने लायक फिल्म है।

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