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गंभीर दिमागी चोट के मरीजों के लिए वरदान बन रही ‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’

–   देश में हर साल 10 लाख से अधिक मामले
–   सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच जगी नई उम्मीद
–   छह महीने अचेत रहने के बाद चमत्कारी सुधार
–   शोध में भारत अग्रणी, सरकार से प्रोत्साहन की मांग

नई दिल्ली। देश में गंभीर दिमागी चोट (ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी) से पीड़ित मरीजों के लिए ‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’ और न्यूरो-रिहैबिलिटेशन एक नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। ‘सोसायटी ऑफ रीजेनरेटिव साइंसेज’ द्वारा आयोजित एक प्रेस वार्ता में लखनऊ के मरीन इंजीनियर आकाश सक्सेना की प्रेरणादायक कहानी साझा की गई। आकाश छह महीने तक ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (गहरी अचेत अवस्था) में रहने के बाद इस आधुनिक चिकित्सा पद्धति की मदद से अब पूरी तरह स्वस्थ हो रहे हैं।

प्रेस वार्ता में विशेषज्ञों ने बताया कि भारत दुनिया में ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी (TBI) का सबसे बड़ा बोझ उठाने वाले देशों में शामिल है। देश में हर साल 10 लाख से अधिक लोग गंभीर दिमागी चोट का शिकार होते हैं, जिनमें से एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है। इसके लगभग 60 फीसदी मामलों के लिए सड़क दुर्घटनाएं जिम्मेदार हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में मरीज स्थायी विकलांगता या चेतना शून्य अवस्था में पहुंच जाते हैं।

यह विषय हाल ही में तब राष्ट्रीय चर्चा में आया, जब 11 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने 13 वर्षों से अचेत अवस्था में रह रहे एक व्यक्ति को ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी थी। ऐसे समय में चिकित्सा विज्ञान की यह प्रगति मरीजों के लिए जीवन की नई संभावनाएं लेकर आई है।
मरीन इंजीनियर आकाश सक्सेना जहाज पर 15 फीट की ऊंचाई से गिर गए थे। कई अस्पतालों में इलाज के बाद भी वे कोमा में रहे और अपनों को पहचानने या बोलने में असमर्थ थे। छह महीने बाद जनवरी 2022 से मुंबई में उनकी रीजेनरेटिव मेडिसिन, व्यापक पुनर्वास और ऑक्सीजन थेरेपी शुरू की गई।

इस उपचार से उनकी स्थिति में चमत्कारी सुधार हुआ। उनका ग्लासगो कोमा स्कोर (GCS) 7 से बढ़कर 15 हो गया है, जो सामान्य चेतना का संकेत है। अब आकाश स्पष्ट रूप से बातचीत कर सकते हैं, खुद बैठ और खा सकते हैं तथा सहारे से चलने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रेस वार्ता में आकाश ने थोड़ी-थोड़ी हकलाते हुए पत्रकारों से बीतचीत भी की।

संस्था की ओर से डॉ नंदनी ने बताया कि भारत रीजेनरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। विश्वभर में प्रकाशित 960 शोधपत्रों में से 196 भारत से हैं। एम्स (नई दिल्ली) और पीजीआईएमईआर (चंडीगढ़) जैसे संस्थान इस दिशा में बेहतरीन कार्य कर रहे हैं।

सोसायटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा से इस चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने, नियामकीय बाधाएं दूर करने और इसे ‘आयुष्मान भारत योजना’ में शामिल करने की मांग की है। वहीं, आकाश सक्सेना के परिवार ने भी प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी आपबीती साझा करने का समय मांगा है।

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