‘गिव द गिफ्ट ऑफ लाइफ’ – फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला तथा नेशनल ऑर्गेन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइज़ेशन (नोटो) ने अंगदान के बारे में जागरूकता बढ़ायी

– नोटो अधिकारियों और शीर्ष प्रत्यारोपण क्लीनिशियनों ने साझा की क्लीनिकल जानकारी, अंगदान के बारे में गलत धारणाओं को दूर किया और बताया कि किस प्रकार जागरूकता भारत में अंगदान की संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रतीक्षा सूची वाले मरीजों को दिला सकती है जिंदगी का बेशकीमती का उपहार –
नई दिल्ली: विश्व अंगदान दिवस 2026 की पूर्व-संध्या पर, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला ने नेशनल ऑर्गेन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइज़ेशन (नोटो) के सहयोग से ‘गिव द गिफ्ट ऑफ लाइफ’ के महत्वपूर्ण विषय पर एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसका मकसद भारत में प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध अंगों की भारी कमी के बारे में लोगों को जागरूक बनाना, भारत तथा पश्चिमी देशों के बीच मृतकों के अंगदान की दरों में मौजूदा अंतर को कम करना, तथा देशभर में इस बारे में जानकारी बढा़ने के साथ-साथ मृतक अंगदान संकल्पों में प्रतिभागिता को बढ़ावा देना था।
कॉन्फ्रेंस में भाग ले रहे प्रमुख हेल्थकेयर विशेषज्ञों ने अंगदान की राह में पेश आने वाली मुख्य चुनौतियों पर चर्चा की और सर्जिकल समाधानों के बारे में जानकारी दी तथा अंग दान की संस्कृति विकसित करने के लिए रणनीति की रूपरेखा बतायी। इस पैनल का नेतृत्व डॉ अनिल कुमार, डायरेक्टर, नेशनल ऑर्गेन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (नोटो), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार कर रहे थे। उनके साथ, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला के डॉ ज़ेड एस मेहरवाल, चेयरमैन एवं हेड, एडल्ट कार्डियाक सर्जरी; डॉ विवेक विज, चेयरमैन, लिवर ट्रांसप्लांट एंड हेपेटो-बिलियरी साइंसेज़; डॉ संजीव गुलाटी, चेयरमैन, नेफ्रोलॉजी; डॉ पंकज पंवार, एडिशनल डायरेक्टर, यूरोलॉजी एवं डॉ विक्रम अग्रवाल, वाइस प्रेसीडेंट एंड एसबीयू हेड, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला भी उपस्थित थे।
भारत में अंग दान के क्षेत्र में काफी कमी बनी हुई है और अंग दान की दर प्रति मिलियन की आबादी पर 1 (पीएमपी) के मामूली आंकड़े से भी कम है, जो कि स्पेन (~49 पीएमपी) तथा अमेरिका (~22–26 पीएमपी) जैसे पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 2020 से 2024 के दौरान, 2,805 मरीजों की मृत्यु अंग प्रत्यारोपण का इंतजार करते हुए हो गई, जबकि मार्च 2026 को करीब 90,000 मरीज नेशनल ट्रांसप्लांट प्रतीक्षा सूची में थे। प्रत्यारोपणों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, मृत डोनर अंगों की संख्या कुल प्रत्यारोपणों का मात्र 18% ही है, जो कि इस बात का सूचक है कि देश में मृत अंग दान में विस्तार करने की आवश्यकता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, डॉ अनिल कुमार, डायरेक्टर, नेशनल ऑर्गेन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (नोटो), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने कहा, “भारत के पास वर्ल्ड-क्लास सर्जिकल विशेषज्ञता और अत्याधुनिक ट्रांसप्लांट इंफ्रास्ट्रक्चर है, लेकिन इस बावजूद हर साल मृत अंग डोनर्स की संख्या में भारी कमी की वजह से कई बहुमूल्य जीवन असमय ही समाप्त हो जाते हैं। एक मृत डोनर से ही आठ जिंदगियों को बचाया जा सकता है और टिश्यू डोनेशन के जरिए दर्जनों अन्य मरीजों की जीवन गुणावत्ता में सुधार किया जा सकता है। हमारा उद्देश्य इस राह में पेश आने वाली प्रशासनिक अड़चनों, समाज में अंगदान के बारे में फैली गलतफहमियों को दूर करना और यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक को अपने अंगों को दान करने के संकल्प के जीवनरक्षक प्रभावों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए।”
डॉ ज़ेड एस मेहरवाल, चेयरमैन एवं हेड, एडल्ट कार्डियाक सर्जरी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला ने कहा, “एंड स्टेज हार्ट फेलियर के साथ जीवन बिता रहे मरीज के लिए, हार्ट ट्रांसप्लांट ही नए जीवन का एकमात्र विकल्प है। ट्रांसप्लांट मेडिसिन में हुई प्रगति, और ग्रीन कॉरिडोर जैसी तालमेल आधारित प्रणालियों के चलते हमें डोनर अंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में काफी मदद मिली है और डोनर से प्राप्तकर्ता तक अंगों को सुरक्षित तरीके से पहुंचाने की हमारी क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है। लेकिन अभी भी इस पूरी श्रंखला में एक कड़ी गायब है और वो है दान के लिए उपलब्ध अंगों का अभाव। हमें अंगदान को अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में शामिल करना होगा और साथ ही, लोगों को अंगदान के अपने संकल्पों को रजिस्टर कराने के लिए भी प्रेरित करना होगा। हर डोनर में किसी दूसरे व्यक्ति को नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करने की क्षमता होती है। अंगदान के बारे में जागरूकता और प्रतिभागिता बढ़ाकर, हम यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि प्रतीक्षा सूची में मरीजों की संख्या कम हो सके और वे वहां केवल इस वजह से इंतजार नहीं करते रहें कि उस वक्त उचित हृदय उन्हें प्रत्यारोपण के लिए नहीं मिल पाया था जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।”


