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क्या ‘स्टेबलकॉइन’ पर असली पैसे जितना भरोसा किया जा सकता है?

नई दिल्ली: हर साल बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) दुनिया में पैसे के बदलते स्वरूप का आकलन करता है। अपनी ताजा वार्षिक रिपोर्ट में उसने डिजिटल पैसे के एक रूप में लोकप्रिय हो रहे स्टेबलकॉइन पर खास चर्चा की है। इस रिपोर्ट में BIS एक अहम सवाल उठाता है: क्या स्टेबलकॉइन पर भी उतना ही भरोसा किया जा सकता है, जितना हम रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले पैसे पर करते हैं?

इस सवाल का जवाब देने से पहले रिपोर्ट यह बताती है कि पैसे पर लोगों का भरोसा बनता कैसे है। जब कोई आपको 100 रुपये का नोट देता है, तो आप बिना किसी झिझक के उसे स्वीकार कर लेते हैं। आपको पूरा विश्वास होता है कि उसकी कीमत 100 रुपये ही है, क्योंकि हर रुपये के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की गारंटी होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह भरोसा रातों-रात नहीं बना, बल्कि इसे बनने में सदियां लगी हैं।

स्टेबलकॉइन इससे अलग है। यह एक तरह का डिजिटल टोकन है, जिसकी कीमत आमतौर पर एक अमेरिकी डॉलर के बराबर रखने का दावा किया जाता है। इसे किसी सरकार या केंद्रीय बैंक की बजाय निजी कंपनियां जारी करती हैं। आज दुनिया में इस्तेमाल होने वाले 99 प्रतिशत से ज्यादा स्टेबलकॉइन अमेरिकी डॉलर से जुड़े हुए हैं।

स्टेबलकॉइन की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ्तार है। इसके जरिए दुनिया में कहीं भी, किसी भी समय, कुछ ही सेकंड में पैसा भेजा जा सकता है। इतना ही नहीं, इसे इस तरह तैयार किया जा सकता है कि भुगतान तभी हो, जब पहले से तय शर्त पूरी हो जाए। उदाहरण के लिए, किसी विक्रेता को भुगतान तभी मिले, जब सामान की डिलीवरी हो चुकी हो।

हालांकि, BIS का कहना है कि स्टेबलकॉइन अभी भी सामान्य पैसे जितने भरोसेमंद नहीं हैं। कई बार एक डॉलर के बराबर रहने वाला स्टेबलकॉइन कुछ समय के लिए उससे कम कीमत पर कारोबार करने लगता है। इसके अलावा, इनका लेन-देन ऐसे खुले ऑनलाइन नेटवर्क पर होता है, जहां निगरानी सीमित होती है। यही वजह है कि इनका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग और दूसरे गैरकानूनी कामों में होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

रिपोर्ट भारत जैसे देशों के लिए भी चेतावनी देती है। इसमें कहा गया है कि अगर लोग अपनी बचत बैंकों में रखने के बजाय डॉलर से जुड़े स्टेबलकॉइन में रखने लगें, तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। बड़ी मात्रा में पैसा बहुत कम समय में देश से बाहर जा सकता है, जिससे स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा और केंद्रीय बैंक के लिए अर्थव्यवस्था को संभालना मुश्किल हो सकता है। वहीं, अगर लोगों की बचत बैंकों में कम होगी, तो बैंकों के पास कर्ज देने के लिए भी कम पैसा बचेगा। इसका सीधा असर यह होगा कि लोगों और कारोबारियों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है।

तो फिर BIS क्या सलाह देता है? रिपोर्ट स्टेबलकॉइन पर रोक लगाने की बात नहीं करती। इसके बजाय, वह कहती है कि इनके लिए ऐसे मजबूत नियम बनाए जाएं, जिससे लोगों का पैसा सुरक्षित रहे और जोखिम कम हो। साथ ही, स्टेबलकॉइन की अच्छी खूबियों, जैसे तेज़ और आसान भुगतान, को मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था के साथ जोड़ने की जरूरत है।

रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पैसा केवल तकनीक नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे पर टिकी एक व्यवस्था है। इस भरोसे को बनने में सदियां लगी हैं। इसलिए कोई भी नई तकनीक ऐसी होनी चाहिए, जो इस भरोसे को और मजबूत बनाए, न कि धीरे-धीरे उसे कमजोर करे। डिजिटल पैसे को लेकर नीतियां बना रहे भारत के लिए यह रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण और समय पर आई चेतावनी है।

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