
FICCI के PubliCon 2026 में कॉपीराइट, शोध की सत्यनिष्ठा और मानवीय रचनात्मकता को बताया गया अनिवार्य; प्रकाशकों, शोधकर्ताओं और WIPO ने जिम्मेदार AI के इस्तेमाल की पैरवी की
नई दिल्ली: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को मानवीय रचनात्मकता, शोध और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाने वाले एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि मानव निर्णय क्षमता के विकल्प के तौर पर। यह बात वैश्विक प्रकाशन और शोध जगत के विशेषज्ञों ने नई दिल्ली में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) द्वारा आयोजित PubliCon 2026 में कही। “Copyright, Research Integrity and Publishing in the AI Era” विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में प्रकाशकों, लेखकों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने चर्चा की कि बौद्धिक संपदा, शोध की सत्यनिष्ठा और जनविश्वास की रक्षा करते हुए प्रकाशन जगत AI का प्रभावी उपयोग कैसे कर सकता है।
डॉ. गीता वाणी रयासम, निदेशक, CSIR–National Institute of Science Communication and Policy Research (CSIR-NIScPR), ने कहा कि AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ शोध की सत्यनिष्ठा और जागरूकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा, “AI टूल का इस्तेमाल करने से उसकी जिम्मेदारी उस टूल पर स्थानांतरित नहीं हो जाती। जिम्मेदारी मानव उपयोगकर्ता की ही रहती है। यदि AI गलत जानकारी, फर्जी संदर्भ, गलत आंकड़े या ‘हैलुसिनेशन’ उत्पन्न करता है, तो उस जानकारी का उपयोग करने की जिम्मेदारी लेखक या शोधकर्ता की ही होगी।”
शोध समुदाय में जागरूकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. रयासम ने कहा, “कई छात्र और विशेष रूप से शुरुआती स्तर के शोधकर्ता हमेशा यह नहीं जानते कि साहित्यिक चोरी (plagiarism), शोध कदाचार या अनैतिक शोध व्यवहार में क्या शामिल है। इसलिए शोध नैतिकता और सत्यनिष्ठा को अकादमिक एवं शोध प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि AI के इस्तेमाल का पारदर्शी तरीके से खुलासा किया जाना चाहिए और लेखकों को AI से तैयार जानकारी, संदर्भों, आंकड़ों और उद्धरणों का सत्यापन अवश्य करना चाहिए।
सुश्री कैरोलिन सटन, CEO, STM Association, ने कहा कि प्रकाशन उद्योग आज विश्वास, AI और शोध की सत्यनिष्ठा के एक महत्वपूर्ण संगम पर खड़ा है। उन्होंने कहा, “STM का मिशन विश्वसनीय शोध को आगे बढ़ाना है। ऐसे समय में जब लोगों के लिए यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है, सत्यापित ज्ञान के स्रोतों की रक्षा करना, उन्हें मजबूत करना और उनमें विश्वास पैदा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।”
सुश्री सटन ने कहा कि शोध संचार एक ऐसी ज्ञान-व्यवस्था का हिस्सा है जो निरंतर स्वयं को सुधारती है और जिसे पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “जब AI वैज्ञानिक या अकादमिक जानकारी प्रस्तुत करता है, तो हमें उसके स्रोतों में पारदर्शिता चाहिए। हमें यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि किसी उत्तर के पीछे ज्ञान की पूरी कड़ी क्या है, किन शोधकर्ताओं के योगदान ने उस उत्तर को संभव बनाया और यदि शोध में कोई गलती हुई है, तो उसे पहचाना और सुधारा जा सके।” उन्होंने कहा कि दांव पर केवल अकादमिक प्रकाशन का भविष्य नहीं, बल्कि शोध संचार को आधार देने वाली स्वयं-सुधारक ज्ञान प्रणाली की विश्वसनीयता भी है।
सुश्री सारा नासर, Associate Program Officer, World Intellectual Property Organization (WIPO), ने चर्चा में बौद्धिक संपदा का वैश्विक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि AI प्रशिक्षण और कॉपीराइट वाली सामग्री के इस्तेमाल को लेकर प्रकाशकों के सामने तेजी से जटिल और अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं उभर रही हैं। उन्होंने कहा, “AI ने यह उजागर किया है कि अलग-अलग देश एक ही मूल प्रश्न का अलग-अलग जवाब देते हैं—क्या किसी कॉपीराइट वाली सामग्री का इस्तेमाल बिना अनुमति किसी मशीन को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा सकता है?”
सुश्री नासर ने कहा कि विभिन्न देशों में कानूनी स्थिति अलग है। यूरोपीय संघ में टेक्स्ट और डेटा माइनिंग के लिए कुछ अपवादों के साथ opt-out व्यवस्था है, जबकि अमेरिका में ऐसे मामलों पर सामान्यतः fair-use के सिद्धांतों के तहत विचार किया जाता है और जापान ने AI प्रशिक्षण को लेकर ऐतिहासिक रूप से अपेक्षाकृत व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने कहा, “एक प्रकाशक के लिए एक ही पुस्तक, एक ही रिपॉजिटरी में, एक बाजार में AI प्रशिक्षण के लिए कानूनी रूप से इस्तेमाल योग्य हो सकती है, जबकि दूसरे बाजार में नहीं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि ‘नियम क्या है?’ बल्कि यह भी है कि ‘किसका नियम और कहां लागू होता है?’



